प्रदूषण शब्द का इस्तेमाल करने से यह पता नहीं चल पाता कि हालात कितने डरावने हैं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंडन नदी के किनारे बसे गांवों के लोग अनेक बीमारियों से जूझ रहे हैं.
पानी पिए बिना जी नहीं सकते और जैसा पानी वे पी रहे हैं उसके बाद भी उनका जीना मुश्किल है.
नदी के किनारे बसे गांव ख़ुशहाल होते हैं, गांव में नदी होना ख़ुशक़िस्मती मानी जाती है, लेकिन एक गांव है गांगनौली, इस गांव की बदक़िस्मती यही है कि वह नदी के किनारे बसा है.
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से निकलने वाली नदी हिंडन, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के छह ज़िलों बागपत, शामली, मुज़फ़्फ़रनगर, मेरठ और ग़ाज़ियाबाद से होती हुई यमुना में मिलती है.
इन ज़िलों के 154 गांव हिंडन और इसकी सहायक नदियों कृष्णा और काली के किनारे बसे हैं और यहां के लोग इन ज़िलों में लगे कल-कारख़ानों की क़ीमत चुका रहे हैं.
सरकारी फ़ाइलों के मुताबिक़, छह ज़िलों में लगभग 316 फ़ैक्ट्रियां हैं जिनमें से 221 फ़ैक्ट्रियां चल रही हैं, इनका कचरा नदियों में जाता है इसलिए नदियों का पानी ज़हरीला हो चुका है, लेकिन मामला इतना सीधा-सादा नहीं है.
अगर ऐसा होता तो गांव के लोग नदी का पानी पीने के बदले कुएं, ट्यूबवेल या हैंडपंप का पानी पी सकते थे. लेकिन ज़हरीला पानी ज़मीन के नीचे तक पहुंच चुका है यानी अब उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा.
वे जानते हैं कि हर घूंट के साथ ज़हर उनके शरीर में जा रहा है. गहरा भूरा, लाल पानी पीकर बीमारियां झेलना और मरना मानो इनकी नियति बन गई है.
यहां पानी में निकल, पारा, कैडमियम, सल्फ़ाइड, क्लोराइड जैसे जानलेवा हैवी मेटल काफ़ी ज़्यादा मात्रा में है, जिसके कारण गावों के हैंडपंप का पानी ज़हरीला हो चुका है ऐसे ही 154 गांवों में से एक है गांगनौली.
ईंट और मिट्टी से बनी सड़क पर चलते हुए हमारी मुलाक़ात जितेंद्र से हुई. जब हम जितेंद्र के घर पहुंचे तो उन्होंने पड़ोसी के घर से पानी मंगाया और बताया, ''हमारे घर में लगे नल का पानी हम नहीं पिला सकते. बग़ल वालों ने फ़िल्टर लगवाए हैं तो आपके लिए पानी ले आए.''
अपनी 12 साल की बेटी नेहा को गोद में लिए जितेंद्र बताते हैं, "पैदा हुई तो एक साल तक हमें सब कुछ ठीक लगता रहा लेकिन जब ये एक साल तक चलने की कोशिश भी नहीं कर सकी तो हमने डॉक्टर को दिखाया. उन्होंने बताया कि यहां के पानी के कारण इसके दिमाग़ पर असर पड़ा है और अंगों का विकास नहीं हो पा रहा है. अब इसका कोई इलाज नहीं हो सकता है, हमने डॉक्टर के पास जाना छोड़ दिया है."
ये कहते हुए वे बेबस नज़रों से अपनी बेटी को बार-बार देखते हैं और उसका सिर सहलाते हैं. जिस उम्र में नेहा को स्कूल जाना चाहिए, अपने हमउम्र बच्चों के साथ खेलना चाहिए उस उम्र में नेहा चल-फिर तक नहीं सकती, अपने हाथों से खाना नहीं खा सकतीं. यहां तक कि वह ये भी नहीं बता सकती कि उसे कब शौचालय जाना है. नेहा अकेली नहीं है बल्कि कई ऐसे बच्चे-नौजवान इस गांव में हैं जो जन्मजात अपंगता से जूझ रहे हैं.
साल 2016 में बागपत के चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर ने गांगनौली गांव में एक मेडिकल सर्वे कराया था. उनकी रिपोर्ट के मुताबिक़, इस गांव में 37 लोग कैंसर, चर्म रोग, हैपेटाइटस और अपंगता जैसी समस्या से पीड़ित थे. इनमें से कुछ की मौत भी हो चुकी है. वहीं एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक़, इस गांव में बीते दो साल में 71 लोगों की मौत कैंसर से हुई है.
साल बदला लेकिन हाल नहीं
साल 2015 में 'दोआब पर्यावरण समिति' नाम के एक संगठन की याचिका पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि जिन भी ज़िलों का पानी प्रदूषित है वहां स्वच्छ पीने लायक़ पानी मुहैया कराया जाए.
जब ये आदेश आया तो अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे और समाजवादी पार्टी की सरकार थी लेकिन अब पूर्ण बहुमत वाली भाजपा की योगी सरकार है. राज्य में सरकार तो बदल गई है लेकिन इन छह ज़िलों के प्रभावित गांवों में शायद ही कुछ बदला है.
यहां के पानी ने कृष्णा की दुनिया ही उजाड़ दी है. कृष्णा के पति शिव कुमार 35 साल के थे और कैंसर से पीड़ित थे. डेढ़ साल पहले ही उनकी मौत हो गई. अपने तीन बच्चों के लिए अब कृष्णा ही अकेला सहारा हैं जो खेतों में मज़दूरी करके इन्हें पाल रही हैं.
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