सोशल मीडिया, वेबसाइट्स और स्मार्टफोन में डार्क मोड काफी पॉपुलर है. कई लोग इसे पसंद करते हैं और हमेशा इस मोड का इस्तेमाल करते हैं. खास तौर पर रात में इसे यूज करना आंखों के लिए अच्छा होता है. वॉट्सऐप पर भी डार्क मोड जल्द आ रहा है. इससे बैटरी की भी बचत होगी साथ ही लेट नाइट मैसेजिंग ऐप यूज करने में भी दिक्कत कम होगी.
डार्क मोड
WAbetainfo की एक रिपोर्ट के मुताबिक वॉट्सऐप के लिए डार्क मोड का डेवेलपमेंट चल रहा है और यह जल्द ही आ सकता है. बताया जा रहा है कि यह मोड सबसे पहले iOS के लिए दिया जाएगा फिर बाद में एंड्रॉयड के लिए जारी किया जाएगा.
ये फीचर्स भी वॉट्सऐप पर जल्द मिलने वाले हैं
वीडियो कॉल के लिए शॉर्टकट
नए फीचर के जरिए डायरेक्ट वीडियो कॉल की शुरुआत होगी. इसमें वॉयस कॉल भी शामिल है. WABetainfo की एक रिपोर्ट के मुताबिक पुराने वर्जन में नॉर्मल कॉल के बाद ग्रुप कॉल शुरू कर सकते थे, लेकिन वॉट्सऐप के नए इंप्रूवमेंट्स के बाद अब डायरेक्ट वीडियो कॉल किए जा सकते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक शुरुआत में यह फीचर iOS यूजर्स क लिए आएगा और इसकी शुरुआत अगले हफ्ते से होगी. इस महीने के आखिर तक एंड्रॉयड यूजर्स को भी ये फीचर दिया जा सकता है.
वॉट्सऐप वीडियो मैसेज नोटिफिकेशन प्रिव्यू
WhatsApp के इस नए अपडेट के बाद कई लोगों को समय समय पर शर्मिंदा होना पड़ सकता है. कई बार आपके पास पर्सनल और संवेदनशील वीडियो कॉन्टेंट भेजे जाते हैं जिसे आप किसी के साथ शेयर नहीं करना चाहते. लेकिन इस फीचर के बाद नोटिफिकेशन पैनल में ही वो वीडियो कुछ समय के लिए प्रिव्यू के तौर पर प्ले होगा.
वेकेशन मोड
वेकेशन मोड से आर्काइव चैट्स को वेकेशन मोड में डालकर इसे लंबे समय तक के लिए म्यूट रखा जा सकता है. यानी इसके बाद से आर्काव किए गए ग्रुप्स या इंडिविजुअल चैट्स में अगर किसी ने मैसेज किया फिर भी ये अन आर्काइव नहीं होगा और आपको नोटिफिकेशन नहीं मिलेगा.
ख़िलाफ़ केस लड़ रहा है
Thursday, December 6, 2018
Wednesday, November 28, 2018
जल ही जीवन नहीं, जल ही ज़हर है जहां- ग्राउंड रिपोर्ट
प्रदूषण शब्द का इस्तेमाल करने से यह पता नहीं चल पाता कि हालात कितने डरावने हैं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंडन नदी के किनारे बसे गांवों के लोग अनेक बीमारियों से जूझ रहे हैं.
पानी पिए बिना जी नहीं सकते और जैसा पानी वे पी रहे हैं उसके बाद भी उनका जीना मुश्किल है.
नदी के किनारे बसे गांव ख़ुशहाल होते हैं, गांव में नदी होना ख़ुशक़िस्मती मानी जाती है, लेकिन एक गांव है गांगनौली, इस गांव की बदक़िस्मती यही है कि वह नदी के किनारे बसा है.
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से निकलने वाली नदी हिंडन, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के छह ज़िलों बागपत, शामली, मुज़फ़्फ़रनगर, मेरठ और ग़ाज़ियाबाद से होती हुई यमुना में मिलती है.
इन ज़िलों के 154 गांव हिंडन और इसकी सहायक नदियों कृष्णा और काली के किनारे बसे हैं और यहां के लोग इन ज़िलों में लगे कल-कारख़ानों की क़ीमत चुका रहे हैं.
सरकारी फ़ाइलों के मुताबिक़, छह ज़िलों में लगभग 316 फ़ैक्ट्रियां हैं जिनमें से 221 फ़ैक्ट्रियां चल रही हैं, इनका कचरा नदियों में जाता है इसलिए नदियों का पानी ज़हरीला हो चुका है, लेकिन मामला इतना सीधा-सादा नहीं है.
अगर ऐसा होता तो गांव के लोग नदी का पानी पीने के बदले कुएं, ट्यूबवेल या हैंडपंप का पानी पी सकते थे. लेकिन ज़हरीला पानी ज़मीन के नीचे तक पहुंच चुका है यानी अब उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा.
वे जानते हैं कि हर घूंट के साथ ज़हर उनके शरीर में जा रहा है. गहरा भूरा, लाल पानी पीकर बीमारियां झेलना और मरना मानो इनकी नियति बन गई है.
यहां पानी में निकल, पारा, कैडमियम, सल्फ़ाइड, क्लोराइड जैसे जानलेवा हैवी मेटल काफ़ी ज़्यादा मात्रा में है, जिसके कारण गावों के हैंडपंप का पानी ज़हरीला हो चुका है ऐसे ही 154 गांवों में से एक है गांगनौली.
ईंट और मिट्टी से बनी सड़क पर चलते हुए हमारी मुलाक़ात जितेंद्र से हुई. जब हम जितेंद्र के घर पहुंचे तो उन्होंने पड़ोसी के घर से पानी मंगाया और बताया, ''हमारे घर में लगे नल का पानी हम नहीं पिला सकते. बग़ल वालों ने फ़िल्टर लगवाए हैं तो आपके लिए पानी ले आए.''
अपनी 12 साल की बेटी नेहा को गोद में लिए जितेंद्र बताते हैं, "पैदा हुई तो एक साल तक हमें सब कुछ ठीक लगता रहा लेकिन जब ये एक साल तक चलने की कोशिश भी नहीं कर सकी तो हमने डॉक्टर को दिखाया. उन्होंने बताया कि यहां के पानी के कारण इसके दिमाग़ पर असर पड़ा है और अंगों का विकास नहीं हो पा रहा है. अब इसका कोई इलाज नहीं हो सकता है, हमने डॉक्टर के पास जाना छोड़ दिया है."
ये कहते हुए वे बेबस नज़रों से अपनी बेटी को बार-बार देखते हैं और उसका सिर सहलाते हैं. जिस उम्र में नेहा को स्कूल जाना चाहिए, अपने हमउम्र बच्चों के साथ खेलना चाहिए उस उम्र में नेहा चल-फिर तक नहीं सकती, अपने हाथों से खाना नहीं खा सकतीं. यहां तक कि वह ये भी नहीं बता सकती कि उसे कब शौचालय जाना है. नेहा अकेली नहीं है बल्कि कई ऐसे बच्चे-नौजवान इस गांव में हैं जो जन्मजात अपंगता से जूझ रहे हैं.
साल 2016 में बागपत के चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर ने गांगनौली गांव में एक मेडिकल सर्वे कराया था. उनकी रिपोर्ट के मुताबिक़, इस गांव में 37 लोग कैंसर, चर्म रोग, हैपेटाइटस और अपंगता जैसी समस्या से पीड़ित थे. इनमें से कुछ की मौत भी हो चुकी है. वहीं एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक़, इस गांव में बीते दो साल में 71 लोगों की मौत कैंसर से हुई है.
साल बदला लेकिन हाल नहीं
साल 2015 में 'दोआब पर्यावरण समिति' नाम के एक संगठन की याचिका पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि जिन भी ज़िलों का पानी प्रदूषित है वहां स्वच्छ पीने लायक़ पानी मुहैया कराया जाए.
जब ये आदेश आया तो अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे और समाजवादी पार्टी की सरकार थी लेकिन अब पूर्ण बहुमत वाली भाजपा की योगी सरकार है. राज्य में सरकार तो बदल गई है लेकिन इन छह ज़िलों के प्रभावित गांवों में शायद ही कुछ बदला है.
यहां के पानी ने कृष्णा की दुनिया ही उजाड़ दी है. कृष्णा के पति शिव कुमार 35 साल के थे और कैंसर से पीड़ित थे. डेढ़ साल पहले ही उनकी मौत हो गई. अपने तीन बच्चों के लिए अब कृष्णा ही अकेला सहारा हैं जो खेतों में मज़दूरी करके इन्हें पाल रही हैं.
पानी पिए बिना जी नहीं सकते और जैसा पानी वे पी रहे हैं उसके बाद भी उनका जीना मुश्किल है.
नदी के किनारे बसे गांव ख़ुशहाल होते हैं, गांव में नदी होना ख़ुशक़िस्मती मानी जाती है, लेकिन एक गांव है गांगनौली, इस गांव की बदक़िस्मती यही है कि वह नदी के किनारे बसा है.
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से निकलने वाली नदी हिंडन, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के छह ज़िलों बागपत, शामली, मुज़फ़्फ़रनगर, मेरठ और ग़ाज़ियाबाद से होती हुई यमुना में मिलती है.
इन ज़िलों के 154 गांव हिंडन और इसकी सहायक नदियों कृष्णा और काली के किनारे बसे हैं और यहां के लोग इन ज़िलों में लगे कल-कारख़ानों की क़ीमत चुका रहे हैं.
सरकारी फ़ाइलों के मुताबिक़, छह ज़िलों में लगभग 316 फ़ैक्ट्रियां हैं जिनमें से 221 फ़ैक्ट्रियां चल रही हैं, इनका कचरा नदियों में जाता है इसलिए नदियों का पानी ज़हरीला हो चुका है, लेकिन मामला इतना सीधा-सादा नहीं है.
अगर ऐसा होता तो गांव के लोग नदी का पानी पीने के बदले कुएं, ट्यूबवेल या हैंडपंप का पानी पी सकते थे. लेकिन ज़हरीला पानी ज़मीन के नीचे तक पहुंच चुका है यानी अब उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा.
वे जानते हैं कि हर घूंट के साथ ज़हर उनके शरीर में जा रहा है. गहरा भूरा, लाल पानी पीकर बीमारियां झेलना और मरना मानो इनकी नियति बन गई है.
यहां पानी में निकल, पारा, कैडमियम, सल्फ़ाइड, क्लोराइड जैसे जानलेवा हैवी मेटल काफ़ी ज़्यादा मात्रा में है, जिसके कारण गावों के हैंडपंप का पानी ज़हरीला हो चुका है ऐसे ही 154 गांवों में से एक है गांगनौली.
ईंट और मिट्टी से बनी सड़क पर चलते हुए हमारी मुलाक़ात जितेंद्र से हुई. जब हम जितेंद्र के घर पहुंचे तो उन्होंने पड़ोसी के घर से पानी मंगाया और बताया, ''हमारे घर में लगे नल का पानी हम नहीं पिला सकते. बग़ल वालों ने फ़िल्टर लगवाए हैं तो आपके लिए पानी ले आए.''
अपनी 12 साल की बेटी नेहा को गोद में लिए जितेंद्र बताते हैं, "पैदा हुई तो एक साल तक हमें सब कुछ ठीक लगता रहा लेकिन जब ये एक साल तक चलने की कोशिश भी नहीं कर सकी तो हमने डॉक्टर को दिखाया. उन्होंने बताया कि यहां के पानी के कारण इसके दिमाग़ पर असर पड़ा है और अंगों का विकास नहीं हो पा रहा है. अब इसका कोई इलाज नहीं हो सकता है, हमने डॉक्टर के पास जाना छोड़ दिया है."
ये कहते हुए वे बेबस नज़रों से अपनी बेटी को बार-बार देखते हैं और उसका सिर सहलाते हैं. जिस उम्र में नेहा को स्कूल जाना चाहिए, अपने हमउम्र बच्चों के साथ खेलना चाहिए उस उम्र में नेहा चल-फिर तक नहीं सकती, अपने हाथों से खाना नहीं खा सकतीं. यहां तक कि वह ये भी नहीं बता सकती कि उसे कब शौचालय जाना है. नेहा अकेली नहीं है बल्कि कई ऐसे बच्चे-नौजवान इस गांव में हैं जो जन्मजात अपंगता से जूझ रहे हैं.
साल 2016 में बागपत के चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर ने गांगनौली गांव में एक मेडिकल सर्वे कराया था. उनकी रिपोर्ट के मुताबिक़, इस गांव में 37 लोग कैंसर, चर्म रोग, हैपेटाइटस और अपंगता जैसी समस्या से पीड़ित थे. इनमें से कुछ की मौत भी हो चुकी है. वहीं एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक़, इस गांव में बीते दो साल में 71 लोगों की मौत कैंसर से हुई है.
साल बदला लेकिन हाल नहीं
साल 2015 में 'दोआब पर्यावरण समिति' नाम के एक संगठन की याचिका पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि जिन भी ज़िलों का पानी प्रदूषित है वहां स्वच्छ पीने लायक़ पानी मुहैया कराया जाए.
जब ये आदेश आया तो अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे और समाजवादी पार्टी की सरकार थी लेकिन अब पूर्ण बहुमत वाली भाजपा की योगी सरकार है. राज्य में सरकार तो बदल गई है लेकिन इन छह ज़िलों के प्रभावित गांवों में शायद ही कुछ बदला है.
यहां के पानी ने कृष्णा की दुनिया ही उजाड़ दी है. कृष्णा के पति शिव कुमार 35 साल के थे और कैंसर से पीड़ित थे. डेढ़ साल पहले ही उनकी मौत हो गई. अपने तीन बच्चों के लिए अब कृष्णा ही अकेला सहारा हैं जो खेतों में मज़दूरी करके इन्हें पाल रही हैं.
Monday, November 26, 2018
बहू ने सड़क पर फेंका कूड़ा, दलित बुजुर्ग को पीट-पीटकर मार डाला
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है. जहां एक बहू के किए की कीमत उसके ससुर को चुकानी पड़ी. दरअसल, एक महिला ने सड़क पर कूड़ा फेंक दिया. इस बात से नाराज होकर कुछ लोगों ने उस महिला के बुजुर्ग ससुर की लाठी डंडों से पिटाई कर दी. जिस कारण बुजुर्ग ने मौके पर ही दम तोड़ दिया.
मामला शाहजहांपुर जिले के मदनापुर थाना क्षेत्र का है. जहां एक गांव में दलित समुदाय का 60 वर्षीय सीताराम अपने परिवार के साथ रहता था. रविवार को सीताराम की बहू झुमका ने घर बाहर मुख्य सड़क पर कूड़ा फेंक दिया. इल्जाम है कि इस बात नाराज होकर गांव के कुछ लोग महिला के घर पहुंच गए और वहां मौजूद उसके बुजुर्ग ससुर सीताराम की लाठी डंडों से पिटाई कर दी.
बुजुर्ग सीताराम घायल होकर वहीं जमीन पर गिर पड़े. आरोपी मौके से फरार हो गए. परिजन बुजुर्ग को लेकर फौरन अस्पताल पहुंचे. जहां डॉक्टरों ने जांच के बाद सीताराम को मृत घोषित कर दिया. परिवार ने इस संबंध में पुलिस को शिकायत की. पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ आईपीसी की हत्या और एससी-एसटी एक्ट की धाराओं के तहत मुकदमा पंजीकृत किया है.
पुलिस के अनुसार गांव में कूड़े को लेकर सीताराम का गांव के ही बीरबल, अंकित और विश्वनाथ यादव के साथ झगड़ा हुआ था. उस वक्त सीताराम के परिवार का एक सदस्य और वहां मौजूद था. लेकिन वह मौके से भाग गया. जबकि आरोपियों ने सीताराम को पिटाई की. जिससे उसकी मौत हो गई.
पुलिस मामले की छानबीन कर रही है. अभी तक इस मामले में किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है. घटना को लेकर दलित समुदाय के लोगों में रोष है.
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई (ANI)
कुबूल अहमद\मोहित ग्रोवर
नई दिल्ली , 26 नवंबर 2018, अपडेटेड 12:23 IST
संविधान दिवस के मौके पर दिल्ली के विज्ञान भवन में एक कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने संविधान के लागू होने की तारीख याद करते हुए कहा कि यह गर्व की बात है कि सात दशकों में हमारा संविधान महान शक्ति के रूप में स्थापित हुआ.
उन्होंने कहा कि जब संविधान को लागू किया गया था, तो हमारे संविधान की आलोचना की गई थी. सर इवर जेनिंग्स ने इसे बहुत बड़ा और कठोर कहा था, लेकिन समय ने इस आलोचना को कमजोर साबित कर दिया. सात दशकों से हमारा संविधान महान शक्ति के रूप में बना हुआ है.
CJI बोले कि हमारा संविधान हमारा मार्गदर्शन करता है, मुश्किल के समय में भी संविधान ही रास्ता दिखाता है. हमारे हित में यही है कि हम संविधान की सलाह के अनुसार ही चलें. यह हमारे हित में है कि हम संविधान के दायरे में रहते हुए उपर्युक्त सलाह लें. यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो हमें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे.
मामला शाहजहांपुर जिले के मदनापुर थाना क्षेत्र का है. जहां एक गांव में दलित समुदाय का 60 वर्षीय सीताराम अपने परिवार के साथ रहता था. रविवार को सीताराम की बहू झुमका ने घर बाहर मुख्य सड़क पर कूड़ा फेंक दिया. इल्जाम है कि इस बात नाराज होकर गांव के कुछ लोग महिला के घर पहुंच गए और वहां मौजूद उसके बुजुर्ग ससुर सीताराम की लाठी डंडों से पिटाई कर दी.
बुजुर्ग सीताराम घायल होकर वहीं जमीन पर गिर पड़े. आरोपी मौके से फरार हो गए. परिजन बुजुर्ग को लेकर फौरन अस्पताल पहुंचे. जहां डॉक्टरों ने जांच के बाद सीताराम को मृत घोषित कर दिया. परिवार ने इस संबंध में पुलिस को शिकायत की. पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ आईपीसी की हत्या और एससी-एसटी एक्ट की धाराओं के तहत मुकदमा पंजीकृत किया है.
पुलिस के अनुसार गांव में कूड़े को लेकर सीताराम का गांव के ही बीरबल, अंकित और विश्वनाथ यादव के साथ झगड़ा हुआ था. उस वक्त सीताराम के परिवार का एक सदस्य और वहां मौजूद था. लेकिन वह मौके से भाग गया. जबकि आरोपियों ने सीताराम को पिटाई की. जिससे उसकी मौत हो गई.
पुलिस मामले की छानबीन कर रही है. अभी तक इस मामले में किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है. घटना को लेकर दलित समुदाय के लोगों में रोष है.
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई (ANI)
कुबूल अहमद\मोहित ग्रोवर
नई दिल्ली , 26 नवंबर 2018, अपडेटेड 12:23 IST
संविधान दिवस के मौके पर दिल्ली के विज्ञान भवन में एक कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने संविधान के लागू होने की तारीख याद करते हुए कहा कि यह गर्व की बात है कि सात दशकों में हमारा संविधान महान शक्ति के रूप में स्थापित हुआ.
उन्होंने कहा कि जब संविधान को लागू किया गया था, तो हमारे संविधान की आलोचना की गई थी. सर इवर जेनिंग्स ने इसे बहुत बड़ा और कठोर कहा था, लेकिन समय ने इस आलोचना को कमजोर साबित कर दिया. सात दशकों से हमारा संविधान महान शक्ति के रूप में बना हुआ है.
CJI बोले कि हमारा संविधान हमारा मार्गदर्शन करता है, मुश्किल के समय में भी संविधान ही रास्ता दिखाता है. हमारे हित में यही है कि हम संविधान की सलाह के अनुसार ही चलें. यह हमारे हित में है कि हम संविधान के दायरे में रहते हुए उपर्युक्त सलाह लें. यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो हमें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे.
Tuesday, October 30, 2018
महादलित टोला जो बिहार के मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ केस लड़ रहा है
(हममें तो उतना काबू नहीं है जो मुख्यमंत्री से केस लड़ें. हम सरकार के ख़िलाफ़ केस लड़ रहे हैं और सरकार कहती है कि वो गरीबी से लड़ रही है. हम गरीब हैं. आप ही बताइए कि हम क्या करें! गरीबी से लड़ें कि सरकार से.)
ये बृजबिहारी पासवान के शब्द हैं. बृजबिहारी बक्सर ज़िले में नंदन गांव के उन 91 लोगों में शामिल हैं, जिनके ख़िलाफ़ डुमरांव थाने में मुख्यमंत्री के काफ़िले पर पत्थरबाजी के आरोप में मुक़दमा दर्ज है.
नंदन टोला के ये लोग पिछले आठ महीने से सरकार के ख़िलाफ़ केस लड़ रहे हैं, क्योंकि इसी साल 12 जनवरी को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की समीक्षा यात्रा के दौरान नंदन गांव में उनके कारकेड पर पत्थरबाजी की घटना हुई थी.
मामले की प्राथमिकी में दर्ज 91 नामजद आरोपियों में से 28 को गिरफ्तार किया जा चुका है. जो अब जमानत पर रिहा हैं.
पुलिस मामले की चार्जशीट करने की तैयारी में है. क्योंकि डीएसपी ने अपने सुपरविजन रिपोर्ट में अनुसंधान को दुरुस्त माना है तथा पहली प्राथमिकी में दर्ज सभी आरोपों को सही पाया है.
अभियुक्तों को बेल नहीं
हालांकि, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 24 जनवरी को कर्पूरी ठाकुर जयंती के दिन मंच से ये ऐलान किया था कि सरकार बेल का विरोध नहीं करेगी.
मगर आठ महीने बाद भी अभी तक 63 नामजद अभियुक्तों को बेल नहीं मिल पाई है.
नंदन टोला के वॉर्ड-6 के सचिव अनिल राम ख़ुद भी एक अभियुक्त हैं. वो कहते हैं, "मुख्यमंत्री ने कहा था कि सरकार बेल का विरोध नहीं करेगी. मगर सरकारी वकील (पब्लिक प्रॉसिक्युटर) ने बेल का विरोध किया. यही कारण है कि पहले 23 लोगों को बेल मिली और फिर पांच लोगों को."
डीएसपी की निगरानी में अपने ख़िलाफ़ आरोपों के सत्य पाये जाने और चार्जशीट होने की आशंका से डरकर नंदन टोला के लोग आगामी दो अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन धरना और प्रदर्शन की योजना बना रहे रहे हैं.
अनिल राम कहते हैं, "दो अक्टूबर को डुमरांव प्रखंड को ओडीएफ़ घोषित किया जाना है. लेकिन देख लीजिए इसी सड़क के आस-पास जहां आप खड़े हैं. मुख्यमंत्री वाली घटना के बाद से अधिकारियों ने मुंह मोड़ लिया है. सिर्फ कार्रवाई की बात की जा रही है. मगर उस घटना के बाद सात निश्चय की किसी भी योजना का लाभ इस महादलित टोले को नहीं मिल पाया है. दो अक्टूबर को सभी नामजद अभियुक्त और उनके आश्रित धरना-प्रदर्शन करेंगे."
बक्सर का नंदन गाँव
नंदन गाँव बक्सर ज़िले के डुमरांव प्रखंड में आता है. इस गाँव की आबादी क़रीब 5,000 है.
गांव में ओबीसी, एससी और एसटी की बहुलता है. लेकिन नंदन पंचायत के मुखिया बबलू पाठक हैं.
डुमरांव के रास्ते नंदन गाँव में प्रवेश के बाद थोड़ी ही दूर चलने पर नंदन टोला का बोर्ड दिखने लगता है. और वहीं से महादलित टोले का भी आरंभ हो जाता है.
महादलित टोला (रविदास टोला और मुसहर टोला) में अंदर जाने की जो पहली गली मिली उसकी शुरुआत में ही एक बोर्ड लगा था.
इस बोर्ड पर ज़िक्र था कि 'मु़ख्यमंत्री सात निश्चय योजना' के तहत मुखिया बबलू पाठक की देखरेख में प्रमोद पासवान के घर से वीरेन्द्र पासवान के घर तक तीन लाख पांच हजार रुपये की लागत से गली और नाली के पक्कीकरण का काम कराया गया है.
गली में घुसने पर थोड़ी दूर तक गली पक्की मिलती है. दोनों ओर के घर इंदिरा आवास योजना के तहत बने हुए से दिखते हैं, क्योंकि प्राय: घरों में केवल एक ही पक्का कमरा था बाकी के घर या तो मिट्टी के बने हुए या फिर आंगन में एक झोपड़ी डाल दी गई थी.
थोड़ी ही दूर बाद पक्की सड़क खत्म हो गई. अब सामने दोनों तरफ परती खेत थे. खेतों को बांटने वाले आर की जगह एक नाली थी जिसे 'सात निश्चय योजना' के तहत ढका गया था. नाली के ऊपर से ही रास्ता पार करना पड़ता है.
नंदन टोला में थोड़ा अंदर जाने पर ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षी सात निश्चय योजना की हकीकत का सामना हो गया.
गलियों की ढलाई जहां-तहां से और जैसे-तैसे कर दी गई थी. कई घरों की नालियां अभी भी गलियों में बहती मिलीं. अंदर की प्राय: गलियों की हालत कमोबेश एक जैसी थी.
पत्थरबाजी का सच क्या था?
कुछ हिस्सा ढला हुआ मिला मगर कोई भी गली ऐसी नहीं मिली जिसकी ढलाई पूरी हो पाई हो.
ऐसी ही एक गली में अपने दरवाजे के बाहर खड़ीं सुमित्रा देवी के घर के सामने की गली की ढलाई नहीं हुई थी. नाली भी ऐसे ही खुले में बह रही थी.
ये बृजबिहारी पासवान के शब्द हैं. बृजबिहारी बक्सर ज़िले में नंदन गांव के उन 91 लोगों में शामिल हैं, जिनके ख़िलाफ़ डुमरांव थाने में मुख्यमंत्री के काफ़िले पर पत्थरबाजी के आरोप में मुक़दमा दर्ज है.
नंदन टोला के ये लोग पिछले आठ महीने से सरकार के ख़िलाफ़ केस लड़ रहे हैं, क्योंकि इसी साल 12 जनवरी को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की समीक्षा यात्रा के दौरान नंदन गांव में उनके कारकेड पर पत्थरबाजी की घटना हुई थी.
मामले की प्राथमिकी में दर्ज 91 नामजद आरोपियों में से 28 को गिरफ्तार किया जा चुका है. जो अब जमानत पर रिहा हैं.
पुलिस मामले की चार्जशीट करने की तैयारी में है. क्योंकि डीएसपी ने अपने सुपरविजन रिपोर्ट में अनुसंधान को दुरुस्त माना है तथा पहली प्राथमिकी में दर्ज सभी आरोपों को सही पाया है.
अभियुक्तों को बेल नहीं
हालांकि, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 24 जनवरी को कर्पूरी ठाकुर जयंती के दिन मंच से ये ऐलान किया था कि सरकार बेल का विरोध नहीं करेगी.
मगर आठ महीने बाद भी अभी तक 63 नामजद अभियुक्तों को बेल नहीं मिल पाई है.
नंदन टोला के वॉर्ड-6 के सचिव अनिल राम ख़ुद भी एक अभियुक्त हैं. वो कहते हैं, "मुख्यमंत्री ने कहा था कि सरकार बेल का विरोध नहीं करेगी. मगर सरकारी वकील (पब्लिक प्रॉसिक्युटर) ने बेल का विरोध किया. यही कारण है कि पहले 23 लोगों को बेल मिली और फिर पांच लोगों को."
डीएसपी की निगरानी में अपने ख़िलाफ़ आरोपों के सत्य पाये जाने और चार्जशीट होने की आशंका से डरकर नंदन टोला के लोग आगामी दो अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन धरना और प्रदर्शन की योजना बना रहे रहे हैं.
अनिल राम कहते हैं, "दो अक्टूबर को डुमरांव प्रखंड को ओडीएफ़ घोषित किया जाना है. लेकिन देख लीजिए इसी सड़क के आस-पास जहां आप खड़े हैं. मुख्यमंत्री वाली घटना के बाद से अधिकारियों ने मुंह मोड़ लिया है. सिर्फ कार्रवाई की बात की जा रही है. मगर उस घटना के बाद सात निश्चय की किसी भी योजना का लाभ इस महादलित टोले को नहीं मिल पाया है. दो अक्टूबर को सभी नामजद अभियुक्त और उनके आश्रित धरना-प्रदर्शन करेंगे."
बक्सर का नंदन गाँव
नंदन गाँव बक्सर ज़िले के डुमरांव प्रखंड में आता है. इस गाँव की आबादी क़रीब 5,000 है.
गांव में ओबीसी, एससी और एसटी की बहुलता है. लेकिन नंदन पंचायत के मुखिया बबलू पाठक हैं.
डुमरांव के रास्ते नंदन गाँव में प्रवेश के बाद थोड़ी ही दूर चलने पर नंदन टोला का बोर्ड दिखने लगता है. और वहीं से महादलित टोले का भी आरंभ हो जाता है.
महादलित टोला (रविदास टोला और मुसहर टोला) में अंदर जाने की जो पहली गली मिली उसकी शुरुआत में ही एक बोर्ड लगा था.
इस बोर्ड पर ज़िक्र था कि 'मु़ख्यमंत्री सात निश्चय योजना' के तहत मुखिया बबलू पाठक की देखरेख में प्रमोद पासवान के घर से वीरेन्द्र पासवान के घर तक तीन लाख पांच हजार रुपये की लागत से गली और नाली के पक्कीकरण का काम कराया गया है.
गली में घुसने पर थोड़ी दूर तक गली पक्की मिलती है. दोनों ओर के घर इंदिरा आवास योजना के तहत बने हुए से दिखते हैं, क्योंकि प्राय: घरों में केवल एक ही पक्का कमरा था बाकी के घर या तो मिट्टी के बने हुए या फिर आंगन में एक झोपड़ी डाल दी गई थी.
थोड़ी ही दूर बाद पक्की सड़क खत्म हो गई. अब सामने दोनों तरफ परती खेत थे. खेतों को बांटने वाले आर की जगह एक नाली थी जिसे 'सात निश्चय योजना' के तहत ढका गया था. नाली के ऊपर से ही रास्ता पार करना पड़ता है.
नंदन टोला में थोड़ा अंदर जाने पर ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षी सात निश्चय योजना की हकीकत का सामना हो गया.
गलियों की ढलाई जहां-तहां से और जैसे-तैसे कर दी गई थी. कई घरों की नालियां अभी भी गलियों में बहती मिलीं. अंदर की प्राय: गलियों की हालत कमोबेश एक जैसी थी.
पत्थरबाजी का सच क्या था?
कुछ हिस्सा ढला हुआ मिला मगर कोई भी गली ऐसी नहीं मिली जिसकी ढलाई पूरी हो पाई हो.
ऐसी ही एक गली में अपने दरवाजे के बाहर खड़ीं सुमित्रा देवी के घर के सामने की गली की ढलाई नहीं हुई थी. नाली भी ऐसे ही खुले में बह रही थी.
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